
New Madan Mohan Temple
New Madan Mohan Temple
मदन मोहन जी लीला
इक दिन की बात, था संध्याकाल। एकाएक वाणी सुनी, उठे तत्काल।
जड़ में हूँ, बैठे में, यशुमति को लाल। मुझको निकालो, मैं हूँ मदन गोपाल।।
इक दिन मदनमोहन जी को, करके प्रणाम।
चौबे पंडित को दिये, मदन मोहन भगवान।
बोले, मैं तो जाऊँगा अब, नवद्वीप धाम।
तुमको ही पुत्र समान इनका, रखना है ध्यान।।
पुरुषोत्तम चौबे के घर पहुँचे भगवान।
सबके संग खेले मोहन, बन के इंसान।
सबने प्रेम से रखा, उनको पुत्र समान।
न की पूजा, न अर्चन, न कोई मान-सम्मान।।
देखी सनातन प्रभु, ये क्या भगवान!
बैठे हैं कैसे, बन कर बालक समान!
चौबे को डाँटा, बोले, ये हैं भगवान!
ठाकुर की पूजा करो, विधि-विधान।।
रात सनातन प्रभु से, बोले भगवान।
तूने न जाना मुझको अब तक नादान।
न माँगू हीरा मोती, न माँगू मान।
प्रेम को भूखो, माँगू प्रेम को दान।।
स्वप्न में वाणी सुनी, उठे तत्काल।
रो-रोकर माफी माँगी, हो कर बेहाल।।
उधर चौबे को प्रभु ने कहा, न हो उदास।
अब मैं रहूँगा, भक्त सनातन के पास।।
भक्त सनातन बोले, मैं हूँ कंगाल।
न रहने को ठौर, न ही रोटी, न दाल।
ठाकुर तो खावे, पूरी लड्डूअन को थाल।
कैसे रखूँगा चौबे, प्रभु को ख्याल।।
मैं तो संन्यासी, खाऊँ भिक्षा को अन्न।
दो रूखी रोटी खाकर रहूँ प्रसन्न।।
मैं हूँ मजबूर, न ये मेरा कसूर।
क्या ठाकुर को, रूखी रोटी खाना मंजूर?
पीछे न मुझसे माँगे, सब्जी और दाल।
बस का न मेरे, देखो ये सब जंजाल।
सब शर्तें कर ली प्रभु ने, हँस कर मंजूर।
बोले, तुम भी मजबूर, सनातन! मैं भी मजबूर।।
अपने भक्तों से, नहीं रहता मैं दूर।
न तेरा कसूर, न ही मेरा कसूर।।
खा-खा कर रूखी रोटी, हो कर बेहाल।
धीरे से बोले, डर के यशुमति के लाल।
न माँगू सब्जी भाजी, न माँगू दाल।
थोड़ा सा नमक मिलेगा? किया सवाल।।
सनातन हो कर अधीर, बोले, मैं हूँ फकीर।
कैसे खिलाऊँ तुझे, रूखी और खीर?
रूखी ठाकुर की पीर, निकला नैनों से नीर।
हो कर गंभीर, बोले, घर थोड़ी पीर।।
इतने में आए वहाँ, सेठ कपूर।
बोले कुछ, मुझ पर, कृपा करिये हुजूर।
जाना है आगे, लेकिन मैं हूँ मजबूर।
नावें फँसी हैं मेरी, बस थोड़ी दूर।।
यह वृंदावन, यहाँ का यह दस्तूर।
मदन मोहन करते हैं, सबके दुःख दूर।
हम इनसे माँगेंगे, ये हैं सबके हुजूर।
होगा वही, जो होगा, इनको मंजूर।।
कहीं से कोई भी, न दिखती है राह।
आज बचा ले मुझे, शाहों के शाह।
इतने में आँधी आई, आया तूफान।
नावें निकाली प्रभु ने, करके कल्याण।।
तन-मन धन मेरा, सब कुछ दूँगा, मैं दान।
मंदिर बनवाऊँगा मैं, मेरे भगवान।
फिर आया सेठ, हो कर धनवान।
मंदिर बनवाया, बने छप्पन पकवान।।
भक्तों की तब से यहाँ, लगती है भीड़।
खाते हैं ठाकुर, हलवा, पूरी और खीर।।
संत सनातन गोस्वामी की कुटीर।
दर्शन कर लो, वो थे एक सिद्ध फकीर।।
...कर समाधि स्थल, कर लो प्रणाम।
चैतन्य महाप्रभु के थे, वो सच्चे दास।
लिखी थी पुस्तक, हरि भक्ति विलास।।
Contact Number-
Chaya Goswami- +91 7895018012
Ajay Kishore Goswami - +91 9675044722
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HMHQ+W44, Bankebihari Colony, Vrindavan, Uttar Pradesh 281121
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